Sunday, 24 April 2016

               World Oldest Man In INDIA

 A retired cobbler from northern India, Mahashta Murasi, claims he was born in January 1835, making him not only the oldest man on earth, but the oldest to have ever lived, according to the Guinness World Records.

According to indian officials, the man was born at home in the city of Bangalore on January 6th 1835, and is recorded to have lived in Varanasi since 1903. He worked as a cobbler in the city until 1957, when he retired at the already venerable age of 122.

"I have been alive so long, that my great grand-children have been dead for years" explains Mr Murasi. "Somehow death forgot about me. And now there's hardly any hope left. Look at the statistics, nobody dies past 150, even less at 170. At that point, I guess I'm immortal or something. I might as well enjoy it!" 

The information about the purported 179-year-old man actually originated with a fictitious story published by World News Daily Report on 28 February 2014. That site's stock in trade the posting of fake news articles, and a disclaimer on the site states that all "news articles contained within worldnewsdailyreport.com are fiction, and presumably fake news."

OKay, this story about the 179-year-old man in India is fake, but is it possible? According to the Guinness Book of World Records, the longest documented human lifespan is that of Jeanne Louise Calment, who was born in France on
21 February 1875 and passed away at the age of 122 on 4 August 1997. 
you can watch him : https://www.youtube.com/watch?v=XzgYCcWOMMg
 
great dada ji..........!!!! 

Saturday, 9 April 2016

Fire at Kerala's Puttingal temple leaves 84 dead

Aftermath of explosion at Puttingal temple 10 April 2016
Eighty-four people have died in a fire at Puttingal temple in Paravur in the Indian state of Kerala, police say.
The fire started about 03:30 (22:15 GMT Saturday) when an explosion was set off in a store of fireworks ready for celebrations of a local Hindu new year festival, local media reports say.
A building at the temple then collapsed, causing many of the fatalities. More than 200 are injured.
Indian Prime Minister Narendra Modi is travelling to the scene.
He tweeted that the accident was "heart-rending and shocking beyond words".
Those with most serious burns injuries are being treated at the government medical college in Thiruvananthapuram, the state capital.
The impact of the blast was felt in houses up to a kilometre away.
"Huge pieces of concrete were flying through the air. Chunks landed in our yard," said resident Jayashree Harikrishnan.
Indian PM Narendra Modi's tweet about Kerala explosion 10 April 2015
Kerala's Home Minister Ramesh Chennithala has ordered in an investigation into the accident.
"The temple holds an annual firework display every year. We're doing our best to rescue those still trapped," said Mr Chennithala.
"Now the situation is under control... the police are on the spot."
Kerala Chief Minister Oommen Chandy is also due to visit the scene this morning.
The fireworks had been stored ready for celebrations on Thursday of Vishu, a Keralan festival marking the Hindu new year.
Local reports say that police had not given permission for Puttingal temple to hold the fireworks display.
The police are reportedly taking action against the temple administration and the contractors who were putting on the firework display.
Fireworks and firecrackers are commonly used at temple festivals and other public events and accidents are not uncommon.
map

Friday, 25 March 2016

      खोरठा की स्तिथि
            व
            खोरठा एक परिचय
मुख्य भाग :-
1.   खोरठा भाषा एक परिचय
·         खोरठा नाम करण 
·         ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि 
·         सिंधु सभ्याता से संबद्धता
·         आर्य भिन्न मूल 
·         व्याकरण
·         खोरठा भाषा का शब्द भंडार
5.   पत्रिका


                                                         खोरठा भाषा एक परिचय
               
                                     (source form wikipedia )
झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है। 
झारखण्ड में खोरठा बोलने वाले परमंडल उतरी छोटानागपुर,और संथाल परगना आता है. जिसमे हजारीबाग, कोडरमा,गिरिडीह,बोकारो,धनबाद,छात्र,रामगढ,दुमका,साहेबगंज,पकुर,गोड्डा, और जामतारा  है. जिसे हम झारखण्ड के मानचित्र के माधयम से दिखने का प्रयास किये है.

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जहाँ तक खोरठा भाषी जन समूह का प्रश्न है, तो खोरठा भाषा झारखंड के दो प्रमंडलों (उत्तरी छोटानागपूर और संथाल परगना) के अधिकांश की मातृभाषा होने के साथ-साथ झारखंड के चौबीस जिलों मे से पंद्रह जिलों की पूणतः या अंशतः संपर्क भाषा है। अन्यतः इस खोरठा भाषी जनसंख्या को समझने के लिए हम जे0पी0एस0सी0 (झारखंड लोक सेवा आयोग) के परीक्षार्थियों की संख्या से ज्ञात कर सकते हैं कि झारखंड के सबसे बड़े क्षेत्र की भाषा खोरठा भाषा है। तभी तो जे0पी0एस0सी0 में नौ झारखंडी भाषाओं के कुल परीक्षार्थियों में से सिर्फ खोरठा परिक्षार्थी ही लगभग पैंतालीस प्रतिशत थे और बाकी आठों भाषाओं के परीक्षार्थी कुल पचपन प्रतिशत थे।

 खोरठा नाम करण :-
विवेचन से ज्ञात है कि खोरठा शब्द खरोष्ठी का अपभ्रंश है, रूपांतरण क्रम - खोरोष्ठी-         खोरोठी - खोराठा - खोरठा या फिर खरोष्ठी - खोरोठी - खोराठा - खोरठा।
संबद्ध बात को अन्यतः समझें, अपभ्रंश क्रम
बंदोपाध्याय------बनजी, बाँड़ुज्ये
मुखेपाध्याय------मुखर्जी, मुखुटि, मुखुज्जे आदि-आदि।
उसी प्रकार खरोष्ठी -खलोष्ठी- खलोठी
ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि :-

खोरठा के भाषागत अध्ययन-अनुशीलन से लगता है कि इसकी जड़ें मनुष्य के प्रचीनतम विकास काल तक जाती है। इस परिप्रेक्ष्य मे कुछ प्रयोगों पर गौर करें-

(
) ’रंगिया गरूआ अइलइ....’ - यहाँरंगियाशब्द किसी भी रंग का सूचक नहीं है, बल्कि सिर्फ और सिर्फ लाल रंग का निर्देशक है। यानी जिस काल में सिर्फ एक ही प्रारंभिक रंग की पहचान मनुष्य को हो पाई थी तभी का यह शब्द प्रयोग है।

(
) ’गरू सहर-हइ...., गीदर सहर-हइ.....’ यानी मल त्याग के अर्थ मानव और पशु के लिए प्रयोग साम्य भी अति प्रचीनत्व को ही दर्शाता है।

(
) ’मानुस होवा’ - ’ गीदर टा (छउवा टा) मानुस भेलइ।’- और यह प्रयोग प्राचीनत्व के बोध के साथ-साथ यथार्थत बोध भी करवाता है। यानी किसी के मानसिक विकास के बाद ही उसे मनुष्य की श्रेणी में गिनने की सही और यथार्थवादी परंपरा।

(
) हिंसा, हुँड़ा, विजइ करा...’- जब पशु मांस के व्यापार के लिए खस्सी वगैरह का बध कर उसका मांस निकाला जाता है, तो कहा जाता है-’ हिँसा लागल हइ, एक हुँड़ा लइ आन। बिना वजन किये समान रूप से किये गये भाग कोहूँ़ड़ाकहा जाता है। उसी प्रकार भोजन के लिए बुलाने में कहा जाता है-’ खाइक तइयार हइ, चला बिजइ करा यानी शिकारी मानव की प्राचीनता का परिच और उसके साथ ही शिकार के सामूहिक भोज या पशु शिकार की विजय में हिस्सेदारी का द्योतक।

सिंधु सभ्याता से संबद्धता:-
शब्द प्रयोग, लिपि-प्रयोग एवं आज तक अतिवाहित सामाजिक प्रयासों से तो खोरठा भाषा का ऐतिहासिक संबंध लक्षित होता ही है। उसके अतिरिक्त मूल प्रयोग भी इसके द्योतक हैं।

यथा- हड़प्पा और मोहन जोदड़ो शब्दों के अर्थ बतलाए गए हैं, क्रमशः आकस्मिक प्राकृतिक विपत्ति और हड़प्पा का अर्थ और जोदड़ो (मोहेंजोदड़ो) का अर्थ बतलाया गया है, बुरी तरह टूटा-फूटा ;ठंकसल कमवितउमक वत कमेींचमकद्ध।

हम पाते हैं कि खोरठा में हाड़पा (हड़प्पा) और जोदड़ो शब्द का प्रयोग वैसे ही अर्थों में होता है। जैसे- किसी नदी आदि में जब अकस्मात बाढ़ में उफान जाता है, तो खोरठा में कहते हैं-’ एखन नाउ-डोंगी कुछ नाँइ लागतउ, एखन हाड़पा नांभल हउ।वैसे ही जब कोई उपयोगि सुप, खाँची आदि बस्तु लम्बे समय तक उपयोग के बाद काफी टूट-फट जाय तो कहते हैं-’ इटा जोधड़ो भइ गेलोअथवा ’..धोधड़ो भइ गेलो।

सिंधु सम्यता की खुदाई से बैलगाड़ी का आदि रूपसगर गाड़ीकी प्राप्ति हुई है और झारखंड सहित पूरे खोरठा क्षेत्र में सगर-गाड़ी के अवशेष आज भी प्राप्य हैं। इतना ही नहीं यहाँ सड़क का नामकरण भी सगर गाड़ी के ही नाम से जुड़ा है। सड़क को यहाँसगरठकहा जाता है, यानी सगर गाड़ी चलने का रास्ता।

सिंधु सभ्यता की खुदाई से विश्व की संभवतः प्रथम लौह कारीगरी के प्रमाण मिले हैं। उनके वंशज बाद में भी लोहा को पर्याप्त महत्व देते रहे हैं। खोरठा क्षेत्र में आज भी लोहा को बहुत माना गया है। जब कि आर्य प्रथा में लोहा को निकृष्ट धातु माना गया है। जब कि खोरठा क्षेत्र में इसे पवित्र मानकर शिशु कोमठियानाम से लोहे का कड़ा पहनाया जाता है। साथ ही यदि द्विविवाह कहीं हो तो सौत का लोहासइतिनेक लोहापिंधेक रेवाज हे।‘

आर्य भिन्न मूल :-

कुछ भाषा कर्मी गलती से खोरठा सहित पूरे संपर्क भाषा परिवार को आर्य परिवारीय मानते रहे हैं। किंतु यह एक भ्रांति है। शब्द-प्रयोगान्वय से ज्ञात होता है कि खोरठा आर्य भिन्न मूल की भाषा है, तभी तो एक ही प्रकार के शब्द के अर्थ आर्य भाषाओं में जैसे पाए जाते हैं, खोरठा में उससे भिन्न अर्थ प्रयोग में आते हैं। 

जैसे- ’करशब्द का संस्कृतादि आर्य भाषाओं में चार अर्थो में प्रयोग हैं, कर- हाथ, कर-टेक्स, कर-सूर्य/चन्द्र किरण, कर हाथी की सूँड़- करिकर। परंतु झारखंडी भाषाओं सहित खोरठा में कर शब्द निपट भिन्न पाँच अर्थों में प्रयुक्त हैं।करे-करे’, कर काइट के, कर आव, करर्हिं आव आर करहिं बइस यानी धीरे-धीरे बगल होकर इधर आवो, चुपके से आकर नजदीक बैठो। यहाँ खोरठा में कर शब्द पाँच अर्थों में आया है और पाँचो संस्कृत से भिन्न हैं। इसी प्रकार अनेकानेक अन्य दृश्टांत द्रष्टव्य हैं। उसी प्रकार कुछ और शब्द देखें- कटि- संस्कृत मेंकमर’, खोरठा मेंजरा सा मुनि-संस्कृत मे ऋषि, वहीं खोरठा मेंबहुत छोटावइसे हीसूर, ताल, साधना, छंद आदि संस्कृत शब्दों का बिल्कुल ही आर्य भीन्न अर्थ हैं। 

छंद शास्त्र में छंद, रस, अलंकार, सुर, ताल आदि-आदि को जहाँ संस्कृतादि आर्य भाषाओं में बहुत समादृत अथों में लिया गया है, वहीं खोरठा में बिल्कुल ही विपरीत अर्थों में लिया गया है। जैसे- ’ बड़ी छंदाहा...’, ’ छंदरनी जनी लागउ, बात नाँइ सुनतउ।’, छंदाही गाय दूधे नाँइ देतउ’, ’ कि छंद करे हें, बेस से काम कर यहाँछंदका प्रयोग बदमासी, धोखेबाज, बहानेबाज जैसे अर्थ में किया गया है। वैसे ही ताल जहाँ निश्चित लय बद्धता के लिये प्रयोग किया जाता है। खोरठा में देखें- ’ओकर ताल उठल हइ..’, बड़ी तालाहा लोक’, ’ ओकर ताल सम्हार..’ यहाँतालशब्द का प्रयोग मूढ़ता और सनकी भाव को प्रदर्षित करने के लिए हुआ है। इसी प्रकार सुर, रस आदि शब्दों का आर्येत्त्तर अर्थ का प्रयोग खोरठा में होता है। बड़ी सुरियाहा लोक, ओकर सुर चाँपल हइ, ओकर रस खेपालि धरल हइ।



                                                 2.  खोरठा लिपि
किसी भाषा की कतिपय अपनी विशिष्ट ध्वनियाँ होती हैं। उन विशिष्ट ध्वनियों को किसी अन्य भाषा के लिए प्रयुक्त लिपि में अंकित करना कठिन होता है। यानी उधार की लिपि में किसी भाषा के लेखन-पठन में मानकर चलने की विवशता जाती है। यदि जो लिखा जाये वही पढ़ा जाये की आदर्श स्थिति की अपेक्षा करना है तो उस भाषा की पृथक स्वतंत्र लिलि की आवश्यकता पड़ती है। खोरठा सहित झारखंडी भाषाओं में कुछ विशिष्ट ध्वनियाँ विद्यमान हैं जो भारत की अन्य भाषाओं में प्रायः दुर्लभ है। यद्यपि खोरठा भाषा को अंकित करने में नागरी लिपि के व्यवहार को सर्वाधिक मान्यता मिली है किंतु हमारी सभी ध्वनियों को नागरी लिपि उदभाषित करने में सक्षम नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें मान कर चलने की विवशता उत्पन्न होती है। इस विवशता में कई समस्याएँ हैं, जहाँ लेखन में वर्त्तनीगत अराजकता वहीं पाठगत अनेकरूपता। एक लेखक अपनी भाषा की विशिष्ट ध्वनियों के लिए नागरी की जिन ध्वनियों का व्यवहार करता है, वहीं दूसरा लेखक कुछ और ध्वनियों का। इससे सामान्य पाठक को पाठ वाचन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। 

इन्ही कठिनाईयों के चलते झारखंडी भाषाओं हेतु कइयेक नये लिपि बनाये गये जैसे ओलचिकी, बारांगचिति, ओलसिकी, आदि। खोरठा लेखन हेतु डॉ0 नागेश्वर महतो नेखोरठा लिपिका आविष्कार किया जो प्राचीनखरोष्ठीलिपि से मेल खाती प्रतीत होती है। इस लिपि की पहली पूस्तकखोरठा भाषा ज्ञानका लोकार्पण विनोबा भावे विश्वविद्यालय के तत्कालिन कुलपति डॉ0 बहुरा एक्का ने किया था। इस लिपि में कुछ रचनाएँलुआठीमें प्रकाशित हुई हैं परन्तु इसे खोरठा भाषा हेतु विशेष लिपि की मान्यता मिलना बाकी है। 

खोरठा भाषा लेखन हेतु सर्वाधिक नागरी लिपि का प्रयोग हो रहा है और यही सर्वमान्य भी है। वैसे खोरठा भाषा की कुछ रचनाएँ बंगला लिपि में भी प्रकाशित हैं जैसे जीतुलाल शर्मा और भवप्रितानंद ओझा, चामु कामार की रचनाएँ बंगला लिपि में हैं शायद इसलिए कि ये रचनाकार मुलतः बंगला में ही रचना किया करते थे और इनकी कुछेक रचनाएँ खोरठा में भी हैं अतः इनकी खोरठा रचनाओं को भी बंगला संकलन में शामिल कर लिया गया है।

झा-चतुभुर्ज की पुस्तकखोरठा-सदानी भाषा-संस्कृति के विभिनन्न पहलुओं पर विचारमेंसदानी-खोरठा हिन्दी, बंगला, एवं अंग्रेजी के लिये प्रयुक्त लिपियाँ क्या सक्षम हैं?’ लेख में लिखा है, ’ ..वस्तुतइसके अपने मौलिक उच्चारणों के संवाहक वर्णों से बनी लिपि का प्रयोग यदि खोरठा के लेखन उच्चारण के लिए हो तो वह उपादेय रूप में वैज्ञानिकता को प्रदर्शित करेगा..

लिपि पर डॉ0 बी0 एन0 ओहदार अपनी पुस्तकखोरठा भाषा एवं साहित्य (उद्भव एवं विकास)’ मे लिखते हैं, ’...गोटे दुनियाइएक भासाक मूल ध्वनि गुला तो मोटा-मोटी एके हबे करे। तबे भासा भासाक माझें महज गनतीक गइगो ध्वनिक फरक हव-हे। बाकी ध्वनि स्तर पर गोटे दुनियाएक भासा एक। एहे सोइच के दुनआइएक पइत भासा लागिन आपन लिपि नाञ पावा हे। आर एके लिपिं कइ-कइ गो भासा के उखरावल बा लिखल जाहे। जइसे कि रोमन लिपि के अंग्रजी समेत यूरोप के मोटा-मोटी सब भासा आपन लिपिक रूपें आपनवल हथ। सइ रकम नागरी लिपि के हिन्दी समेत भारतेक ढइर आधुनिक भासा गुला अपनावल हथ।

ओहदार जी खोरठा के विशिष्ट ध्वनियों का विवेचन करने के पश्चात अंततः खोरठा लेखन में नागरी लिपि को ज्यादा उपयुक्त मानते हैं। उनके अनुसार इसके लिए किसी विशेष चिन्ह के प्रयोग की भी आवश्यकता नहीं है। वे अपने तर्क को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं,’....स्नतकोत्तर जनजातीय भाखा के प्रोफेसर गिरधारी गंझू, बी0 एन0 ओहदार समेत आरो-आरो लोकेक मत हइन कि लुकाइल ध्वनि के कोन्हों संकेतें देखवेक दरकार नाञ जे खोरठा नाञ् जाने से खोरठा लीखे जाने इटाँइ मगज मारेक दरकान नाञ्। जे खोरठा भाखी हतइ पइढ़ लेतइ। जे खोरठा नाञ् जाने से खोरठा सीखे, जाने इटाँइ मगज मारेक दरकार नाञ्।उनका स्पष्ट विचार है कि जहाँ इस आधुनिकता के दौड़ में खोरठा जैसी भाषाएँ अपनी अस्तित्व के लिए संघर्षरत है, वहाँ नये लिपि में मगजमारी इस भाषा आंदोलन को काफी पिछे ढकेल देगी और हमारा साहित्य लेखन का रास्ता अवरूद्ध हो जायेगा। खोरठा लेखन हेतु नागरी लिपि पर्याप्त है। उनका विचार है कि नागरी लिपि में खोरठा पठन में जो दिक्कतें महसुस की जा रही है वह केवल नागरी माध्यम से हिन्दी, संस्कृत के पठन के पूर्वाभ्यास के कारण है। खोरठा भाषी को इसमें तनिक ही दिक्कत होगी और वह सामान्य रूप से खोरठा पढ-लिख लेंगें। वे बड़े बेरूखी से कहते हैं,’ जो खोरठा भाषी होगा वह पढ़ ही लेगा। जो खोरठा नहीं जानता वह खोरठा सीखे, इसमें माथा-पच्ची करने का दरकार नहीं है।वर्त्तमान समय में नागरी लिपि को ही सर्वग्राह्य लिपि मान लिया गया है और लिपि पर मगजमारी में चंद लोग ही लगे हुए हैं।
http://khortha.in/images/Khortha_Script-1.jpg

खोरठा लिपि में + - का माना गया है और लिखने के क्रम में आकार मात्रा अलग से लगाया जाता है। खोरठा लिपि मेें $ - का लिखा और पढ़ा भी जाता है। अलग आकार की मात्रा खोरठा लिपि में नहीं लगाया जाता है। इसी पाँच स्वर वर्ण को मात्रा की जगर हुबहु लिखा और पढ़ा जाता है। जैसे - +- का, +- कि, +इइ-की, +- के, +एए- कै, +- कु, +उउ- कू, +- के, +एए- कै, +- कु, +उउ- कू, +अउ- को, +अउउ- कौ I

खोरठा भाषा के उच्चारण में आधा वर्ण नहीं होता है और ही संयुक्ताक्षर अक्षर या शब्द होते हैं। ऐसे में इस खोरठा लिपि का प्रयोग खोरठा लेखन में सरलता से किया जा सकता है। खोरठा में जो संयुक्ताक्षर के शब्द प्रचलित हैं वे पूर्णतः संस्कृत अथवा अन्य भाषा के शब्द हैं, बोल चाल में भी स्टेशन कोटिसनऔर व्याकरण कोबेयाकरनउच्चारण किया जाता है।
खोरठा लिपि के लिए 'Anshu' फॉण्ट
डॉ0 नागेश्वर महतो द्वारा बनाई गई इस लिपि को 'Anshu' फॉण्ट के नाम से सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। इसेइंस्टॉलकर इसे नागरी फॉण्ट की तरह टाइप किया जा सकता है| 

http://khortha.in/images/Khortha_Script-3.jpg


खोरठा भाषा का शब्द भंडार:-

खोरठ का अति समृद्ध, व्यापक शब्द भंडार है। इसकी समृद्धि एवं व्यापकता का यह हाल है कि किसी एक ही शब्द के दो सौ से भी अधिक पर्यायवाची शब्द प्रयोग प्राप्य हैं। उदाहरणतः क्षुद्राकार दर्षक प्रयोग के दृश्टांत लें- कटि गो, खाँट, खुदु, गाड़ाक-गुड़ुक, गाड़ार-गुड़ुर, गिधी-गिधी, गिधु-गिधु, गुड़कु, गुड़ना, गुड़रा, गुड़ु, गुड़रू, गुड़ा, गुधुपुटु, गुजनु, गुड़रा, गुड़ी, गेंड़रा, गेड़ा, गेड़मेठा, गेड़े, धुजु, धुटु, चुटी, चुटू, चुटकी, चुकरी, चुटरी, चुटिया, छुटु मुटु, छुटका, छुटन, छुटना, छुटु, छूटकु, टेप, ठेपना, छेपका, छोटका,छोटकु,छोटन, छोटका, जुमना, टिकला, टिका, टिपरा, टिरका, टिरकु, टिरा, टिरू, टुना, टुनु, टुनकू, टूरा, टेपरा, टेपु, ठुठकु, ठुठनु, ठुपना, ठुपनु, ठुपका, ठुरका, ठुरकुु, ठेपना, ठेपा, ठेपो, ठेपु, ठेपुवा, डेढ़बितना, डेढ़ बिताक, डिमा,डिमु, डीबु, डुटू, डुभू, ढुबा, ढुमका, ढुमन, ढुमना, ढुमकु, ढुमा , ढुलकु, ढेबा, ढेमना, ढेलकी, ढुलु, रिगड़िया, रेंगटा, रेंगना, रेघना, रेंघु, रूटा, रूठना, रूठनाहा, रूठनु, रूनु, लुढ़का, लुढ़कु, लुढ़कुन, लुघा, लुघु, लेदना, लेदा, लेदू......

इस प्रकार मात्र पुल्लिंग शब्द रूप प्रय पोने दो सौ हैं। अब चूकि अनेक स्त्रीलिंग रूप भी व्यवहार्य हैं अतः कुल पर्याय दो सौ से अधिक हैं। इस दृश्टि कोण से यह अद्वितीय प्रतीत होता है।






                      3.खोरठा साहित
खोरठा भाषा में प्रकाशित किताबों की सूची:-

क्र0 किताबेक नाम रचनाकार प्रकाशन बर्ष प्रकाशक विशेष
01
बालकिरण (कविता संग्रह) श्रीनिवास पानुरी 1954
02
दिव्य ज्योति (कविता संग्रह) श्रीनिवास पानुरी 1954
03
मेघदूत (अनुदित काव्य) श्रीनिवास पानुरी 1969
04
राम कथामृत (रामकथा महा काव्य) श्रीनिवास पानुरी 1971
05
मालाक फूल (संपादित कविता) सं0-श्रीनिवास पानुरी 1970-72(अनुपलब्ध)
06
खोरठा काठें गइदेक खँड़ी (निबंध) 0 के0 झा 1983
07
खोरठा काठें पइदेक खँड़ी (कविता) 0 के0 झा 1983
08
एक टोकी फूल (लोकगीत संकलन) सं0- 0 के0 झा 1984
09
खोरठा सहित सदानी बेयाकरन 0 के0 झा 1985
10
रूसल पुटुस (कविता संकलन) सं0- शिवनाथ प्रमाणिक 1985 बोकारो खोरठा कमिटी
11
जिनगीक टोह (उपनियास) प्रो0 चितरंजन महतोचित्रा’ 1986
12
कादो फूल (कविता/गीत) धनपत महतो 1986
13
रस-छंद-अलंकार 0 के0 झा/डॉ0 चतुर्भूज 1987
14
खोरठा सहित सदानी भाषा के- 
विभिन्न पहलुओं पर विचार 0 के0 झा/डॉ0 चतुर्भूज 1987
15
खोरठा लोककथा संग्रह संगिया संपादन 1987 बोकारो खोरठा कमिटी
16
समाजेक सरजुइत निसइन (काव्य) 0 के0 झा 1987
17
दामुदरेक कोराञ (प्र0 काव्य) शिवनाथ प्रमाणिक 1987
18
जयदेव झुमैर (गीतगोविन्द ) शेखर गँवार 1987
19
एक मउनी फूल (कविता संग्रह) संतोष कुमार महतो 1988
20
पुटुस फूल (कहनीक बिंड़ा) गजाधर महतो प्रभाकर 1988
21
खोरठा गइद-पइद संग्रह (इंटर) संगिया संपादन 1989
22
खोरठा निबंध बी0 एन0 ओहदार 1990 बिहार जनजातीय अकादमी
23
सोंध माटी (कहनी/कविता ) बिनोद कुमार 1990 बिहार जनजातीय अकादमी
24
बेलंदरी (गीत संकलन ) सं0- शांतिभारत 1990 बोकारो खोरठा कमिटी
25
एक पथिय डोंगल महुआ (कविता ) सं0- संतोष कुमार महतो 1990
26
बिरसा भगवान (प्र0 काव्य) धनपत महतो 1991
27
मेकामेकी ने मेटमाट (नाटक) 0 के0 झा 1991 (अनुमानित)
28
डाह (नाटक) सुकुमार 1992
29
डिंडा़क डोआनि (प्र0 काव्य) बंशी लालबंशी’ 1992 बोकारो खोरठा कमिटी
30
भीस्मेक सत (प्र0 काव्य) फूलचंद महतो 1993
31
खोरठा लोकगीत शिवनंदन पाण्डेयगरीब’ 1994 बोकारो खोरठा कमिटी
32
कोरया फूल (गीत) बासु बिहारी 1994
33
पइन सोखा (गीत) सुकुमार 1995
34
कबिता पुरान (बालकविता) 0 के0 झा 1995
35
मुक्तिक डहर (प्र0 काव्य) श्याम सुन्दर महतोश्याम’ 1995
36
बोनेक बोल (कविता संकलन) सं- रमणिका गुप्ता 1995
37
दीनेक दिया (खोरठा नात) मोमेरा बेगम 1996
38
सँइतल साड़ा (कविता) कृष्ण चंद्र दासआला’ 1997
39
खोरठा भाषा गर्हन कृष्ण चंद्र दासआला’ 1997
40
मइलाइल हवा (कहनी/एकांकी) रामटहल ओहदार 1997
41
खोरठा दर्पण बंशी लालबंशी’ 1998 खो0सा0 सं0 परिषद्
42
तातल हेमाल (कविता) शिवनाथ प्रमाणिक 1998
43
खोरठा गीतांजति (अनुदित) मनमोहन पाठक 1998
44
तोंञ आर हाम (कविता) श्याम सुन्दर महतोश्याम’ 1999
45
चेड़राक मुड़े बेल (काव्य) श्याम सुन्दर महतोश्याम’ 1999
46
माराफरी (प्र0 काव्य) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2000
47
महुआ (गीत) मनपूरन गोस्वामी 2000
48
भगत आर भजन (गीति नाट्य) मनपूरन गोस्वामी 2000
49
रंगइनि (खोरठा छेतरेक गाछ-पाल्हा) अनिल कुमार गोस्वामी 2000
50
संेवाति (गीत संकलन) सं0- सुकुमार 2000
51
संेवातिक बूंद (कविता) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2000
52
झिंगा फूल (गीत) घनश्याम महतो 2000
53
खोरठा लोकगीत श्याम सुन्दर महतोश्याम’ 2000
54
फरीछ डहर (कहनीक गोछ) पंचम महतो 2001 बालीडीह खोरठा कमिटी
55
हिलोर (गीत) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2001 बालीडीह खोरठा कमिटी
56
चाँदीक जूता (हास्य-व्यंग्य) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2002 बालीडीह खोरठा कमिटी
57
मधु काव्य (कविता) प्रयाग गोस्वामी 2002
58
खोरठा व्याकरण कर एक खोमचा बासुदेव महतो 2003
59
खोरठा भाषा ज्ञान (लिपि परिचय) डॉ0 नागेश्वर महतो 2003
60
केवड़ा फूल (हाँसी-ठाठा) फुतेश्वर करमाली 2003
61
खटरस (कहनीक गोछ) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
62
अजगर (नाटक ) विश्वनाथ दसौंधीराज’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
63
भगजोगनी (उपनियास) विश्वनाथ दसौंधीराज’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
64
खोरठा भूँइ-पाठ श्याम सुन्दर केवटरवि’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
65
खोरठा देसभगती गीत मनपूरन गोस्वामी 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
66
पुटुस आर परास (कविता) विश्वनाथ दसौंधीराज’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
67
चेठा (लघुकथा) गिरिधारी गोस्वामीआकाशखूँटी’ 2004 बालीडीह खोरठा कमिटी
68
जिनगीक भेउ (कविता) परितोष कुमार प्रजापति 2004 खो0 सा0 सं0 परिषद्
69
खोरठा लोक साहित्य शिवनाथ प्रमाणिक 2004 खो0 सा0 सं0 परिषद्
70
खइयाम तोर मधुर गीत(अनुदित) विश्वनाथ प्र0 नागर 2004 पूजा प्रकाशन
68
मुरगा छाप फटक्का (हास्य/व्यंग्य) राम शरण विश्वकर्मा 2005
69
राँगा लाठी (कविता) विश्वनाथ प्र0 नागर 2005 पूजा प्रकाशन
70
सुलकसाय (प्र0 काव्य) विश्वनाथ प्र0 नागर 2005 पूजा प्रकाशन
71
घुइर मुड़री बेल तर (लघुकथा) विश्वनाथ दसौंधीराज’ 2005 बालीडीह खोरठा कमिटी
72
ईशावाष्योपनिषद् (अनुदित) मणि लालमणि’ 2005 बालीडीह खोरठा कमिटी
73
लोर (कविता) जनार्दन गोस्वामीब्यथित’ 2005 बालीडीह खोरठा कमिटी
74
करमइति (करमा लोकगीत) सं- श्याम सुन्दर केवटरवि’ 2006 बालीडीह खोरठा कमिटी
75
सालुक फूल (कविता) कैलाश महतोब्यथित’ 2006
76
परासचित (नाटक) मनपूरन गोस्वामी 2006 बालीडीह खोरठा कमिटी
77
चाभी-काठी (नाटक) श्रीनिवास पानुरी 2006 बालीडीह खोरठा कमिटी
78
परास के फूल (कविता) महेन्द्र प्रबुद्ध 2006 उषा पब्लिेकेशन
79
सोहान लागे रे (गीत संकलन) सं0- दिनेश दिनमणि 2006 धारा
80
धुँगा (कहनीक गोछ) अरविन्द कुमार 2007 बालीडीह खोरठा कमिटी
81
के हराम खोर? (लघुकथा) धनंजय प्रसाद 2007
82
तीन काठ धान (नाटक) महेन्द्र प्रबुद्ध 2007 उषा पब्लिेकेशन
83
बड़की माय (नाटक) मनपूरन गोस्वामी 2007
84
छाँहइर (कहनीक गोछ) प्रो0 चितरंजन महतोचित्रा’ 2007
85
खोरठा भाषा-साहित्य (उद्भव-विकास) बी0 एन0 ओहदार 2007 खोरठा भाषा-साहित्य अकादमी
86
चन्दूलाल चौकीदार (नाटक) महेन्द्र प्रबुद्ध 2008 उषा पब्लिेकेशन
87
खोरठाक खूँटा-तितकी राय मो0 सिराजउद्दीन अंसारीसिराज’ 2008 बालीडीह खोरठा कमिटी
88
माटीक पुथइल (कहनीक गोछ) विश्वनाथ दसौंधीराज’ 2008 बालीडीह खोरठा कमिटी
89
मन चरयाँ (जातरा बिरतांत) पंचम महतो 2005 बालीडीह खोरठा कमिटी
90
पारसनाथ (लघु उपनियास) इमतियाज गदर 2008 सानी प्रकाशन
91
लाल बुझक्ड़ (लोककथा) महेन्द्र प्रबुद्ध 2008 उषा पब्लिेकेशन
92
मारूति (नाटक) मनपूरन गोस्वामी 2008
93
ढरकल लोर (कहनीक गोछ) डॉ0 डी0 सी0 राम 2008
94
झुमइर एकइसा देबु लाल गोस्वामी 2009 बालीडीह खोरठा कमिटी
95
के तोंञ (कविता) पारस नाथ महतो 2009 खोरठा विकास परिषद्
96
दू डाइर जिरहूल फूल (गइद-पइद) संगिया संपादन 2010 खो0सा0सं0 परिषद्
97
सुरमनी (कहनीक गोछ) इमतियाज गदर 2010 सानी प्रकाशन 98 मानुसेक कद (कविता/गीत) महेन्द्र प्रबुद्ध 2010 उषा पब्लिेकेशन
99
मदन भेड़ी (गीत संकलन) सं0- सुकुमार 2010
100
आगु जनमें (एकांकी नाटक) गिरिधारी गोस्वामीआकाशखूँटी 2010 बालीडीह खोरठा कमिटी
खोरठा भाषा में प्रकाशित पत्रिकाएँ संपादक आरंभ अन्यान्य

01 ’
मातृभाषा’ (हिन्दी - खोरठा ) श्रीनिवास पानुरी जनवरी,1957 बरवाअड्डा, (धनबाद)
02 ’
खोरठा’ (पखवारी) श्रीनिवास पानुरी 1970 बरवाअड्डा, (धनबाद)
03 ’
तितकी’ (मासिक बुलेटिन) विश्वनाथ दसौंधीराजअगस्त, 1977 कतरास , (धनबाद)
04 ’
तितकी’ (मासिक) 0 के0 झाझारपात’ 1983 कोठार , (रामगढ़)
05 ’
तितकी’ (अनियतकालिन) शांतिभारत/दिनेश दिनमणि 1997 बोकारो 
06 ’
लुआठी’ (तिमाही)/अनि0/मासिक गिरिधारी गोस्वामीआकाशखूँटीअक्टूबर, 1999 बोकारो
07 ’
सहिया’ (दूमहिनवाँ) अनिल कुमार गोस्वामी 2000 बोकारो
08 ’
परास फूल’ (अनियतकालिन) महेन्द्र प्रबुद्ध 2008 धनबाद
09
दुलरोउति बहिन(मासिक) विजय कुमार महापात्र 2007 जगतसिंहपूर,(उड़ीसा)
10 ’
करील’ (त्रैमासिक) डॉ0 पारस नाथ महतो 2009 ओरमाँझी, (राँची)
11 ’
इंजोर’ (अनि0) धनंजय प्रसाद 1997 मधुपूर (देवघर)




                                               4.खोरठाक साहितकार
खोरठा साहित पुरोधा श्रीनिवास पानुरी
विश्वनाथ दसौंधिराज
शिवनाथ प्रमाणिक
विश्वनाथ दसौंधिराज
डॉ0 0 के0 झा
सुकुमार
कृष्ण चंद्र दासआला
डॉ0 नागेश्वर महता
प्रो0 नरेश नीलकमल
खोरठा साहित पुरोधा श्रीनिवास पानुरी  (खोरठा में)

खोरठा भासाँइ गीत झुमइर सें उपर उइठशिष्ट साहित्यके बेबस्थित रचना कइर खोरठा भासा साहितेक डँड़वे वाला जते जइ लोक भेला, श्रीनिवास पानुरी जीक नाम सबले उपर लेल जाहे। जोदि पानुरी जीक खोरठाशिष्टसाहितेक जनक कहल जाय तो बेजाँइ नाय।

श्रीनिवास पानुरी जीक जनम 25 दिसंबर 1920 0 के बरवाअड्डा (धनबाद) में भेल हलइ। इनखर बापेक नाम शालीगाम पानुरी आर मायेक नाम हलइ दूखनी देबी। पानुरी जीक पढ़ा सुना जिला इसकुल धनबाइदें मेटरिक तक भेलइ। पानुरी जी गरीबीक चलते बेसी पढ़ लिखे नाय पारला आर आपन खानदानी पेसाँइ लाइग गेला। धनबाइदेक पूरना बजारें गिरहस्तीक गाड़ी चलवे ले पान गुमटी खोलला। इनखर पान गुमटीं बइस छेतरेक नाम जइजका साहितकार सब साहितिक चरचा करऽ हला। जकर परभाउ इनखर भीतरेक साहितकारेक उपर पड़लइ आर इनखर भीतर केकविबाहराइ लागलइ। 

 
सुरू में हिन्दी में फेर खोरठें लिखेक सुरू करला। वइसें तो इनखर लेखन आजादीक आगुवे ले सुरू भइ गेल हलइ जइसन कि पता चले हे, आर तखनेकआदिवासीपतरिका जे राँची से बाहराहल ओकर मे इनखर रचना छप हल। धनबादेकआवाजआरयुगान्तरमें प्राय इनखर रचना छपऽ हल मेंतुक इनखर पहिल एकल खोरठा संकलन छपलबालकिरणआर कुछ महिनाक बाददिव्य ज्योति’ 1954 सालें।बाल किरनखोरठाक पहिल छपल किताब मानल जाहे। केउ केउ उनखर पहिल रचनातितकीके मानथ मेंतुक एकर कोन्हों प्रमाण नाय पावा हे।

पानुरी जी खोरठा पत्रकारिताक जनको मानल जा हथ सबले आगु जनवरी 1957 सालेमातृभाषानामेक मासिक पत्रिका संपादित करला जेकर में एक संगे हिन्दी आर खोरठा रचना छपऽ हलइ।एकर बाद फेर 1970 सालें दोसर पत्रिका संपादन करला ले असलें पहिल खोरठा अखबार हलइखोरठा’ (पखवारी)

इनखर बेसी ख्यातिमेघदूतसें भेलइ जे 1968 सालें छपल आर एकर चरचा तखनेक साहितकार सब खुब करला। तकर दू बछर बाघींरामकथमृतछपलइ जकर खोरठा रामायण रूपें परचार करल गेलइ।

मूलतःकवि हला मेंतुक नाटक लेखन आर मंचन बाट ओतने हूब हलइ। से समय धनबाद छेतरे घुइर घुइर नाटक मंचन करऽ हला आर कवि मंच तो हइये हलइ। खास कइरउदभासल कर्नआरचाभी काठीनाटक बेसी मंचित करल जा हे चाभी काठी बुझा हे बिनोद बिहारी महतो जीक चरित टा राइख देल हला जे उनखर सहयोगी आर प्रसंसक हला।

पानुरी जी से समयेक नामजइजका हिन्दी साहितकारेक संपर्के हला जे उनखर साहितिक प्रतिभाक कायल हला। जइसें राहूल सांस्कृत्यायन, पं0 रामदयाल पांडे, बेधड़क बनारसी, आचार्य शिवपूजन सहाय, हंस कुमार तिवारी, जानकी वल्लभ शास्त्री, राधाकृष्ण, डा0 बीरभारत तलवार, मनमोहन पाठक आर विकल शास्त्री जीक नाम मुइख रूपें लियल जाइ सके हे।
उनखर निकट सहयोगी हला नारायण महतो (अधिवक्ता), विश्वनाथ प्र0 नागर, नरेश नीलकमल, विश्वनाथ दसौंधीराज’, फुलचंद मंडल आर उनखर उपर बरद हस्त हलइ कतरासेक राज पूर्णेदू नारायण सिंह आर बिनोद बिहारी महतो जीक।
खोरठा आर हिन्दी में लगभग चालीस किताब लिखला जइसन चरचा हे जकर में जकर पूर पूरा छपेक जानकारी पावा हे हे- बाल किरण, दिव्यज्योति, मेघदूत, रामकथमृत, मालाक फूल (संपादित), समाधान (हिन्दी) आर हाल फिलहाल छपलचाभी काठी उनखर कइयेक पांडुलिपि खोरठा पाइठक्रमे राखल गेल हे आर छपेक आसाँइ हे।

1957
में आकाशवाणी राँची सुरू भेल बाद इनखर खोरठा कविता आर बारता परसारित हवे लागलइ। राँची विश्वविद्यालय मेंजनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाबिभाग खुलल बाद बाँचल तक संपादक मंडल के सदइस रहला।

7
अक्टुबर, 1986 के अचक्के हिरदय कति रूकल सें सिराय गेला। मेंतुक आइज खोरठा सहितेक बोड़ गाछ एते झबरल पसरल देखा हे सेटा पानुरी जी के रोपल हलइ। 

पानुरी जीक खोरठा साहितें एक छितर राइजेक चलतें 1950 से 186 0 तक के चलीस साल खोरठा साहितेेपानुरी जुगके नाम से जानल जाहे।
                                6.पत्रिका
लुआठी एक परिचय
खोरठा जाने खातिरलुआठीपढ़ा!
खोरठा साहित्यिक-सांस्कृतिक मासिक पत्रिका - लुआठी 
-
खोरठा झारखंडें सबले बेसी पसरल भासा हे। झारखंडेक चोउबिस जिलाक मइधें उनइस जिलें बोलल जाहे।
-
खोरठा झारखंडेक मूलबासीक आर कइएक आदिवासी समुदायेक मातरी भासा हे। खोरठांचलेक आदिवासी आर मूलवासीक संपर्क भासा हे।
-
खोरठा झारखंडेक दोसर भासा नागपूरी, कुरमाली, आर पंचपरगनियाँ सें आंतरिक समानता राखे हे। माने चाइरो झारखंडी भासा-भासी एक दोसर सें बिना दोसर भासाक सहायता सें संवाद करे पारथ।
-
खोरठा के पढ़ाई नोउ (9) कलास सें एम00 तक भइ रहल हे। कइयेक पी0एच-डी0,डी0लीट0 करल हथ आर कइर रहल हथ।खोरठा बिसइ लइनेट’, ’जेट’, आर जे0आर0एफ0 कइर रहल हथ।
-
झारखंडेक भिनु-भिनु प्रतिजोगि परीछा जेरंग झारखंड-पूलिस, प्राथमिक शिक्षक, बी0एड हेन तेन में जरूरी बिसइ रूपें राखल गेल हे।
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जे0पी0एस0सी0’ मुइख परीछे खोरठा भासा-आर साहित सामिल हे।
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खोरठा झारखंडेक सबले बेसी सुगम आर सुबोध भासा हे, जकर चलते गइर खोरठा भासीयो खोरठा सिखे ले अगुवाइ रहल हथ।
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झारखंडें एखनलुआठीखोरठा भासाक एकाइ पतरिका हे जे भारत सरकारेक आर0एन0आई0 सें माइनता पाइल हे।
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लुआठीं सब रकमेक मनोरंजक रचना छाड़ा खोरठा पढ़वइया गीदर खातिर बिसेस अध्ययन सामग्री छापे हे।
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खोरठा भासा, एकर साहित, खोरठा छेतरेक गतिविधि आर झारखंडेक संस्कीरतिक जाने खातिरलुआठी’’ पढ़ा।